रामायणम् में रावण-जटायु की लड़ाई नई दिल्ली: रणबीर कपूर, यश और साई पल्लवी के अभिनय वाली फिल्म ' रामायणम् ' दिवाली के अवसर पर 5 नवंबर को रिलीज होने जा रही है। उससे पहले इस फिल्म के निर्देशक नितेश तिवारी ने यह खुलासा किया है कि फिल्म में रावण और जटायु की लड़ाई को पर्दे पर उतारने में शुरुआती ब्रीफिंग से लेकर फाइनल फ्रेम तक साढ़े छह साल का समय लगा। इसमें से लगभग दो साल तो सिर्फ पुष्पक विमान को डिजाइन करने में ही लग गए। एक फाइनल डिजाइन पर पहुंचने से पहले टीम ने इसके 40 से 50 वर्जन बनाए। चूंकि इस पौराणिक विमान का फाइनल डिजाइन मूल कॉन्सेप्ट से थोड़ा अलग हो गया था, इसलिए फिल्ममेकर ने बताया कि कई बार बदलाव करने के बाद इस लड़ाई वाले सीक्वेंस पर फिर से काम करना पड़ा। फिल्म के जटायु से जुड़े कुछ सीन सामने आए तो सोशल मीडिया पर लोगों ने रामायणम् और फिल्मकारों पर जमकर भड़ास निकाली। नितेश तिवारी ने कहा-रावण-जटायु की लड़ाई फिल्माने में 6.5 साल लगे इस लड़ाई के पीछे किए गए काम के पैमाने पर बात करते हुए नितेश तिवारी ने 'श्रेयस मीडिया' से कहा, 'क्या आप जानते हैं कि रावण और जटायु की लड़ाई को पूरा करने में हमें कितना समय लगा? जब मैंने पहली बार आर्टिस्ट को ब्रीफ किया, तब से लेकर काम पूरा होने तक, पूरे साढ़े छह साल लग गए। सिर्फ एक एक्शन सीक्वेंस! मैं इस बारे में घंटों बात कर सकता हूं कि हर चीज को बिल्कुल शुरुआत से बनाने में कितनी मेहनत लगी है। और इस पर हजारों लोगों ने काम किया है।' उनके इस बयान पर सोशल मीडिया एक्स पर एक ने लिखा-'दो हाथ, दो पैर और दो पंख...इस प्रतिष्ठित दृश्य को बनाने में वीएफएक्स कलाकार के पास बिल्कुल भी दिमाग नहीं था।' वहीं, एक और ने नितेश तिवारी पर तंज कसते हुए लिखा-आप क्या पका रहे हो? आपको महाकाव्य के बारे में नहीं पता तो टांग मत अड़ाओ: यूजर एक्स पर एक यूजर ने लिखा-'अगर आपको इतिहास (महाकाव्य) के बारे में नहीं पता, तो इसमें अपनी टांग मत अड़ाओ।' रावण द्वारा माता सीता का अपहरण किए जाने के बाद जटायु की भेंट प्रभु श्रीराम से हुई थी। युद्ध के मैदान में, इंद्रजीत द्वारा 'नागबंधन' अस्त्र का प्रयोग किए जाने के बाद गरुड़ की भेंट प्रभु श्री राम से हुई थी। ऐसे सीन जोड़े गए जो कभी मूल ग्रंथ में ही नहीं थे एक और यूजर ने लिखा-बॉलीवुड 'रामायण' पर 4,000 करोड़ रुपये खर्च कर रहा है, और वह भी ऐसे दृश्य जोड़ने के लिए जो मूल ग्रंथ में कभी थे ही नहीं! यूजर ने आगे लिखा कि क्या वनवास से पहले अयोध्या में जटायु, प्रभु राम के साथ कोई गहरा रिश्ता बना रहे थे? वाल्मीकि को जटायु के बलिदान को हजारों सालों तक अमर बनाने के लिए किसी बनावटी 'बैकस्टोरी' की जरूरत नहीं पड़ी थी। जटायु ने रावण से इसलिए लड़ाई नहीं लड़ी थी कि उनका अयोध्या से बचपन का कोई भावनात्मक लगाव था। उन्होंने रावण से इसलिए लड़ाई लड़ी क्योंकि अधर्म के खिलाफ खड़ा होना उनका कर्तव्य था। निस्वार्थ धर्म को सस्ते, आधुनिक 'मेलोड्रामा' में बदल देना, भारतीय फिल्म निर्माताओं की वह सबसे बड़ी गलती है जिसे वे बार-बार दोहराते हैं।क्या यह 'क्रिएटिव लिबर्टी' (रचनात्मक स्वतंत्रता) है, या फिर फिल्म निर्माताओं की एक और अनावश्यक गलती? एक्स यूजर जटायु इंसान जैसा दिख रहा, पक्षी की पहनी है पोशाक एक और यूजर ने लिखा-'नमित मल्होत्रा की 1,600 करोड़ रुपये से ज्यादा बजट वाली रामायणम् बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी असफलता क्यों लग रही है। यूजर ने आगे लिखा-गलत कास्टिंग और किरदारों का सही न होना नितेश तिवारी की कास्टिंग बिल्कुल भी मेल नहीं खाती। युवा श्रीराम के रोल में रणबीर कपूर बहुत ज्यादा उम्रदराज लग रहे हैं, जबकि साई पल्लवी की स्टाइलिंग में माता सीता की दिव्य आभा और गरिमा नजर ही नहीं आती। जटायु एक ऐसे इंसान की तरह क्यों लग रहा है जिसने पक्षी की पोशाक पहनी हो और अपने दोनों हाथों से फूल फेंक रहा हो? अगर DNEG शरीर की बनावट (anatomy) जैसी बुनियादी चीजें भी ठीक से नहीं दिखा सकता, तो कोई बाकी VFX पर कैसे भरोसा कर सकता है? समस्या सिर्फ इतनी ही नहीं है, पूरी फिल्म एक बड़ी तबाही (disaster) साबित होने की ओर बढ़ रही है। एक्स यूजर 'एनिमल' वाली छवि का मेल न खाना यूजर ने आगे लिखा कि 'एनिमल' फिल्म में रणबीर कपूर को एक हिंसक और खून से सने 'अल्फा' किरदार में देखने के बाद, उन्हें पर्दे पर श्रीराम के रूप में स्वीकार करना नामुमकिन है। एक डार्क और आक्रामक छवि को अचानक दिव्य पवित्रता में बदलने से दर्शकों के मन में एक बड़ा डिस्कनेक्ट पैदा होता है। TV सीरियल जैसे विज़ुअल्स यूजर ने आगे लिखा कि फिल्म में इस्तेमाल किए गए चमकीले पीले रंग के फिल्टर और जरूरत से ज्यादा प्रोसेस की गई लाइटिंग इसे एक भव्य, करोड़ों के बजट वाली सिनेमैटिक एपिक (महागाथा) के बजाय, किसी सस्ते TV डेली सोप जैसा दिखाती है। फिल्म की दुनिया को बेहतर ढंग से गढ़ने के बजाय स्टूडियो के प्रचार-प्रसार पर हजारों करोड़ खर्च करने की वजह से यह फिल्म अंदर से खोखली लगती है। जब इतने बड़े बजट के बावजूद सस्ते विज़ुअल ट्रिक्स और गलत कास्टिंग देखने को मिले, तो एक बड़ा सवाल उठता है। क्या यह असली सिनेमा है, या सिर्फ बहुत ज्यादा हाइप किया गया एक 'टेक डेमो'? लेखक के बारे में दिनेश मिश्र दिनेश मिश्र, नवभारत टाइम्स (डिजिटल) में असिस्टेंट एडिटर और एक्सप्लेनर एक्सपर्ट हैं। वे अप्रैल-2024 में टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के नवभारत टाइम्स, डिजिटल विंग से जुड़े। दिनेश मिश्र NBT डिजिटल में एक्सप्लेनर और स्पेशल स्टोरीज की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। ये एक्सप्लेनर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय, बिजनेस और एंटरटेनमेंट समेत किसी भी कैटेगरी की खबरों से जुडे होते हैं, जिसमें दिनेश मिश्र रणनीतिक रूप से डीप डाइव, रिसर्च, वैल्यु एड, एक्सपर्ट कमेंट्स जैसी जरूरी बातें शामिल होती हैं। इन एक्सप्लेनर को लेकर वीडियो भी करते हैं। साथ ही NBT डिजिटल के स्थायी कॉलम मंडे मोटिवेशन, ट्यूजडे ट्रीविया और वेडनेसडे बिग टिकट के लिए डीप डाइव रोचक स्टोरी भी लिखते हैं। वह हर एक्सप्लेनर स्टोरी में सटीक संपादन के साथ-साथ रियल टाइम का ध्यान रखते हैं। इसके अलावा, वे गूगल ट्रेंड से जुड़ी स्टोरीज भी करते आए हैं, जो अहम टास्क है। दिनेश मिश्र ने प्रयागराज महाकुंभ की ग्राउंड कवरेज की है। साथ ही 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान खबरों को डेस्क और ग्राउंड दोनों से कवर किया है। 2025 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ स्टेट असेंबली इलेक्शंस (हालिया महाराष्ट्र और बिहार चुनाव) के दौरान भी डेस्क से ओपिनियन पीस लिखने के साथ-साथ रियल टाइम एक्सप्लेनर भी किए। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों के खिलाफ एनबीटी फैक्ट चेक भी करते रहे हैं। दिनेश मिश्र अपने करीब 16 साल के कॅरियर के दौरान प्रिंट मीडिया और डिजिटल मीडिया में डेस्क, ग्राउंड रिपोर्टिंग और इंटरव्यू करने के साथ अलग-अलग भूमिकाओं में काम करते आए हैं। हिंदी और गीत-संगीत में दखल रखने वाले दिनेश मिश्र ने कई किताबों की समीक्षा भी की। दिनेश मिश्र ने जाने-माने गीतकार गुलजार और गोपालदास नीरज का इंटरव्यू किया, हिंदी के महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के अनुभवों को लेकर ग्राउंड रिपोर्टिंग भी की। दिनेश मिश्र ने शोले के निर्माता-निर्देशक रमेश सिप्पी का इंटरव्यू भी किया। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का इमरजेंसी के अनुभव पर इंटरव्यू किए और 1996 से लेकर 2001 तक अमेरिका में भारत के राजदूत रहे नरेश चंद्रा का भी इंटरव्यू किया है। इसके अलावा, हिंदी के बड़े लेखक गिरिराज किशोर और विश्वनाथ त्रिपाठी का इंटरव्यू भी किए। नेशनल-इंटरनेशनल, बिजनेस और एंटरटेनमेंट की खबरों को लेकर मीडिया और सोशल मीडिया पर नजर रहती है। पहली प्राथमिकता है किसी भी खबर की सच्चाई के साथ विश्लेषण करना। इसके बाद उसका असर कहां और कितना पड़ेगा, इसे लेकर भी अवेयर रहते हैं। पत्रकारिता का अनुभव दिनेश मिश्र का पत्रकारिता का कॅरियर हिंदी के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अखबार दैनिक जागरण, नोएडा के सेंट्रल डेस्क के साथ साल 2010 में शुरू हुआ। इसके बाद से यह सफर 2013 में अमर उजाला, नोएडा से होता हुआ 2016 में राजस्थान पत्रिका के नेशनल इंटीग्रेटेड कंटेंट स्टेशन, नोएडा तक पहुंचा, जहां अखबार के साथ-साथ डिजिटल, टीवी और तीनों ही प्लेटफॉर्म पर एकसाथ काम किए। इसके बाद दिनेश मिश्र ने फिर 2019 में अमर उजाला में लौटे, जहां से 2021 में दैनिक भास्कर के डीबी डिजिटल में काम किया और एक्सप्लेनर और डीप डाइव-रिसर्च और स्पेशल स्टोरीज की बारीकियां सीखीं। इसके बाद अप्रैल, 2024 में दिनेश मिश्र देश के प्रतिष्ठित मीडिया समूह टाइम्स ऑफ इंडिया के नवभारत टाइम्स से जुड़े। दिनेश मिश्र ने कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी, हरियाणा से पत्रकारिता से एमए किया। उससे पहले महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। उससे भी पहले वो समाज शास्त्र से भी एमए कर चुके हैं। दिनेश मिश्र ने संघ लोक सेवा आयोग की प्रतिष्ठित सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा भी दी है और उत्तर प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन की कई परीक्षाएं भी दीं। इसके अलावा, मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस एंड एमपावरमेंट के एक रिसर्च प्रोग्राम 6 महीने का सर्टिफिकेट कोर्स इन जेरियाट्रिक केयर भी किया है। ... और पढ़ें